11

May
2018

शुरुआतही कुछ ऐसी हुई है|

Posted By : admin/ 132 0

……शुरुआतही कुछ ऐसी हुई है| …जैसे शरीर में ढेर सारी नसें बिछी हुई है, टेढ़ी-मेढ़ी, छोटी-लम्बी, चौड़ी-संकरी और कुछ बेअंत-सी जैसे की बनारस की उलझी हुई सी सुलझी गलियां| सही कह दूँ तो शरीर में एक छोटा सा बनारस बस गया है| और इन नसों में ये गलियां बिछ गई हैं| बसइन्हीं पर भागने का मन होता है| इन में और उलझने का मन होता है| सच में ये हैं तो उलझी हुई लेकिन न जाने कौन सी सुलझन है इन गलियों में| मन करता है हृदय की सीढ़ियों पर पैर लटका के बैठ जाऊं और एक छोटी सी गंगा पैरो को भिगोती हुई बह जाए| हाँ सच में, एक छोटी-सी गंगा बह जाना चाहती है, एक छोटा सा बनारस बस गया है….. इस शरीर में| अबे! बनारस! तुम्हारे अलावा कोई शहर दिखता ही नहीं ..मानो आँखे ही बंद हो गई …बस तू है और मैं हूँ ……साले! तू शहर यागर्लफ्रेंड (?)दिल-दिमाग से उतरता ही नहीं | यारतुझेना…बस धमनियांपसंद है| शिराओं को तो तू देखना भी नहीं चाहता| न जाने कौन सी धमनियोंमें बहा चला आया मैं…और यहाँ तू मेरी धमनियों में बह गया| निकलने का नाम सुनकर ही नसें फूल जाती हैं| ….फिर भागता हूँ अपनी ही नसों में यानी तेरी ही गलियों में …टेढ़ी-मेढ़ी, छोटी-लम्बी, चौड़ी-संकरी गलियों में …बेअंत गलियों में ..कही कोई शिरा नहीं …कोई रास्ता नहीं| …फिर सिर पकड़ कर बैठ जाता हूँ| तब तक दिमाग ना….“चौक’’ बनचुका होता है| हाँभई.. तुम्हारी चौक से कम ट्रैफिक नहींहोती इस “चौक” में| वैचारिकवाहन शाय–शायनिकलते है .चीं…पों…लेकिनकमबख्त चौक की भीड़ इतनी निर्दईकी इन्हें भी नहीं निकलने देती| तब तक “छोटा सा बनारस”“चौक” के चारोऔरघूमने लगता है औरधम्म से मुझेपरिधि पर फेंक देता है| अपने ही “बनारस”में, अपनी ही “चौक” से…इतनी दूर परिधि पर ..धम्म से….ना…नाआँखे तो खुलने दे| हाँ मुझे पता है तू बहुत ढीठ है ..यहाँ परिधि है कहाँ…तूने परिधि बनाई कहाँ ……यहाँ तो सब केंद्र है..ढेर सारे केंद्र ..एक-एक व्यक्ति , एक-एक गाली, हर एक गली, एक-एक घाट सब केंद्र है| मेरेकमबख्त दोस्त ! तो मैं परिधि पर क्यूँ??

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