11

May
2018

बनारस में हरसुबह

Posted By : admin/ 242 0

बनारस में हरसुबह कथाओं के साथ होती है | सूरज रोज ढेर सारी कथाएं बनारस में छिड़क देता है | ये कथाएंसबसे पहले घाटों पर बरसती है | सूरज के साथ उगने वाली ये कथाएं कभी अस्त नहीं होती | सच में कथाएं अस्त होती ही नहीं है …बस धूमिल हो जाती है | बनारस की कथाएं धूमिल भी नहीं होती | यहाँमहादेव,हरिश्चन्द्र, कबीर, सबकी कथाएं टहलती हैं या किसी चाय की दुकान पर सुड़की जा रही होती है | उसे नीला रंग बहुत पसंद था| उसनेकभी नहीं माना की पानी का कोई रंग नहीं होता | अक्सर बहती गंगा की ओर उंगली उठाकर कहती थी “देखो पानी नीला होता है |” मुझेनहीं पता की लोग पानी का रंग नीला क्यूँ देखना चाहते हैं ? शायद इसलिए कि किसी ने आँखों को नीला कह दिया था | जाड़ों में गंगा सबसे ज्यादा नीली होती है …. जाड़ों में वह भी बहुत सुंदर हो जाया करती थी | उस रोज भी सूरज ढेर सारी कथाएं लेकर उगा था | सारी कथाएं छिड़क दी थी …औरएक बूँद मुझ पर भी पड़ी थी| मैं घाट पर समूचे बनारस सा खड़ा था … और वह गलियों सी लिपटी थी | मैंने उस दिन देखा था उसके आँसू नीले नहीं थे |  बहती गंगा की ओर उंगली उठाकर कह रही थी “देखोपानी हरा होता जा रहा है |” सच में पानी हरा होता जा रहा था … मैं बस बनारस सा खड़ा था जैसे की बनारस था ही नहीं | गंगा बस बह रही थी जैसे कि वह गंगा थी ही नहीं…… जैसे कि वह लिपटी थी ही नहीं …जैसे कि वह गंगा में हीसमा गई थी ….| मैं अभी तक घाट की सबसे ऊपर की सीढ़ी पर बैठा हूँ | वह अक्सर बरसात में बढ़ने लगती है | सीढ़ियाँचढ़ने लगती है | मुझतक पहुँचना  चाहती है | शायद कहना चाहती है कि“ऐमेरे बनारस मुझे नीला कर दो |”

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